नाटक किसे कहते हैं? || हिंदी गद्य साहित्य का इतिहास || गद्य किसे कहते हैं?

गद्य किसे कहते हैं?नाटक किसे कहते हैं?


हिंदी हमारे देश की मुख्य भाषा है। हमारे देश भारत के प्रत्येक राज्य में हिंदी भाषा  का अध्ययन कराया जाता है।
यदि आप हिंदी भाषा में हिंदी के गद्य साहित्य का इतिहास जानना चाहते हैं एवं उसकी विधाओं के बारे में जानना चाहते हैं तो हमारी इस पोस्ट पर बने रहिए।
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गद्य +नाटक



 हम आपको हिंदी गद्य साहित्य के इतिहास और उसकी विधाओं से परिचित कराएंगे।
तो चलिए अब हम जानते हैं कि गद्य क्या है.....

गद्य:-

"वास्तव में गद्य वह वाक्यबद्ध विचारात्मक रचना है, जिसमें हमारी चेष्टाएँ, हमारे मनोभावों, हमारी कल्पनाएं और हमारी चिंतनशील मन: स्थितियां सुगमतापूर्वक व्यक्त की जा सकती हैं।"

नाटक:-

"नाटक एक अभिनय परक विधा है, जिसमें संपूर्ण मानव जीवन का कुतूहल पूर्ण वर्णन होता है, यह  एक दृश्य काव्य है।जिसका आनंद अभिनय देख कर लिया जाता है ।

 हिंदी नाटक साहित्य का काल विभाजन:-


  1. भारतेंदु काल         :    1837-1904 ई. तक,
  2. संधि काल             :    1904-1915 ई. तक,
  3. प्रसाद काल           :    1915-1933 ई. तक,
  4. वर्तमान काल         :    1933-से आज तक।

हिंदी में नाटक साहित्य को उत्कर्ष पर पहुंचाने का श्रेय जयशंकर प्रसाद जी को दिया जाता है।
 उन्हीं को हिंदी में नाटक का सम्राट कहा जाता है।
हिंदी में नाटक साहित्य को उत्कर्ष पर पहुंचाने का श्रेय जयशंकर प्रसाद जी को दिया जाता है।
 उन्हीं को हिंदी में नाटक का सम्राट कहा जाता है।
        लेखक                            नाटक                         

  1. जयशंकर प्रसाद   : चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी।।       
  2. उदय शंकर भट्ट    : विक्रमादित्य, मुक्तिपथ, दाहर, नया                                   समाज।                                         
  3. जगदीश चंद्र माथुर : कोणार्क, शारदीया, पहला राजा।       
  4. मोहन राकेश।       : लहरों के राजहंस, आधे अधूरे।          


नाटक के प्रमुख तत्व

  1. कथावस्तु
  2. पात्र एवं चरित्र चित्रण,
  3. संवाद या कथोपकथन,
  4. भाषा शैली,
  5. देश काल एवं वातावरण                                                    (संकलनत्रय),
  6. उद्देश्य,
  7. अभिनेता।

 नाटक में संकलनत्रय :

                             नाटक में प्रस्तावित स्थल, काल और कार्य की अन्विति ही संकलनत्रय कहलाती है। यह परम आवश्यक तत्व है।

 संकलन त्रय का महत्व:

 संकलनत्रय के तीन तत्व होते हैं,


  1. प्रस्तावित स्थल,
  2. काल (समय),
  3.  कार्य अन्विति।

1.प्रस्तावित स्थल:

नाटकीय घटना यथार्थ जीवन में एक ही स्थान पर घटित होनी चाहिए।

2.काल (समय):

जिसका तात्पर्य है कि नातकीय घटना यथार्थ जीवन में 24 घंटे से अधिक घटित होने वाली नहीं होनी चाहिए।

3.कार्य अन्विति:

कथावस्तु में केवल एक ही मुख्य कथा हो, उसमें सहकारी, उपकथाएं ना हो।

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